(राग भैरव)
सघन वन छायो प्रफुल्लित द्रुमवेली,
भयो हुलास ब्रज जन मन। [1]
ठोर ठोर कोकिल कल कूजत,
गुंजार मधुप गन॥ [2]
भयो प्रकट आज ऋतुराज,
वास कियो सुनियत वृन्दावन। [3]
रसिक प्रीतम पिय सो रस विलसो,
आनि अर्पो सखि तन मन धन ॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
घने वृक्षों और प्रफुल्लित लताओं से सुसज्जित वन को देखकर, ब्रजवासियों के हृदय आनंद से भर उठते हैं। [1]
चारों ओर कोयल अपनी मधुर तान छेड़ रही हैं, और भौरों के समूह गूँजते हुए मधुर राग गा रहे हैं। [2]
आज ऋतुराज वसंत पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होकर, अपने दिव्य सौंदर्य से वृंदावन की पावन भूमि को सुशोभित कर रहा है। [3]
प्रीतम श्री कृष्ण अपनी प्रिय श्री राधा के साथ प्रेम क्रीड़ा में लीन हैं। हे सखी, अपना तन, मन और धन इस दिव्य युगल के चरणों में समर्पित कर दो। [4]
सघन वन छायो प्रफुल्लित द्रुमवेली,
भयो हुलास ब्रज जन मन। [1]
ठोर ठोर कोकिल कल कूजत,
गुंजार मधुप गन॥ [2]
भयो प्रकट आज ऋतुराज,
वास कियो सुनियत वृन्दावन। [3]
रसिक प्रीतम पिय सो रस विलसो,
आनि अर्पो सखि तन मन धन ॥ [4]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
घने वृक्षों और प्रफुल्लित लताओं से सुसज्जित वन को देखकर, ब्रजवासियों के हृदय आनंद से भर उठते हैं। [1]
चारों ओर कोयल अपनी मधुर तान छेड़ रही हैं, और भौरों के समूह गूँजते हुए मधुर राग गा रहे हैं। [2]
आज ऋतुराज वसंत पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होकर, अपने दिव्य सौंदर्य से वृंदावन की पावन भूमि को सुशोभित कर रहा है। [3]
प्रीतम श्री कृष्ण अपनी प्रिय श्री राधा के साथ प्रेम क्रीड़ा में लीन हैं। हे सखी, अपना तन, मन और धन इस दिव्य युगल के चरणों में समर्पित कर दो। [4]

