वे जमुना, वे सखा हमारे नित नव केली विहारी - श्री सूरदास, सूर सागर (4892)

वे जमुना, वे सखा हमारे नित नव केली विहारी - श्री सूरदास, सूर सागर (4892)

वे जमुना, वे सखा हमारे, नित नव केली विहारी।
वृन्दावनकी गुल्म-लता हैं, मन-मधुकर कों प्यारी॥

- श्री सूरदास, सूर सागर (4892)

श्री कृष्ण सत्यभामा से कहते हैं - मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, वह यमुना, वह हमारे प्रिय ब्रजवासी सखा, सखियों संग नित्य नवीन केली विहार, वृंदावन धाम के पुष्प एवं लताएँ—ये सभी मेरे मन रूपी मधुकर को अत्यधिक प्यारी हैं।