(सवैया)
हरेकृष्ण ही कृष्ण का कीर्तन में, मचता रहे घनघोर यहाँ। [1]
सुनलो सुनलो यमुनाजल में, मुरली ध्वनि का वह शोर यहाँ॥ [2]
तरु राधे ही राधे पुकार रहे, खिंचता मन है बरजोर यहाँ। [3]
कर प्रेम कोई लख ले उसको, रहता अब भी चितचोर यहाँ॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
जहाँ श्रीकृष्ण का नाम-संकीर्तन दसों दिशाओं में गूंज रहा है। [1]
सुनो! यमुना के पावन जल की वह मधुर सरसराहट, जहाँ श्रीकृष्ण की बांसुरी की दिव्य तान नित्य गुंजायमान हो रही है। [2]
यहाँ के वृक्ष, लताएँ और पवन भी ‘राधे-राधे’ की पुकार कर रहे हैं, जिससे जीव का हृदय स्वतः ही इस पावन भूमि की ओर आकृष्ट हो जाता है। [3]
जो कोई निष्कपट प्रेम-भाव से श्रीकृष्ण के दर्शन की आकांक्षा रखता हो, उसे आज भी वृंदावन की इस रसमयी भूमि में वह चित्तचोर सहज ही दृष्टिगोचर होता है। [4]
हरेकृष्ण ही कृष्ण का कीर्तन में, मचता रहे घनघोर यहाँ। [1]
सुनलो सुनलो यमुनाजल में, मुरली ध्वनि का वह शोर यहाँ॥ [2]
तरु राधे ही राधे पुकार रहे, खिंचता मन है बरजोर यहाँ। [3]
कर प्रेम कोई लख ले उसको, रहता अब भी चितचोर यहाँ॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
जहाँ श्रीकृष्ण का नाम-संकीर्तन दसों दिशाओं में गूंज रहा है। [1]
सुनो! यमुना के पावन जल की वह मधुर सरसराहट, जहाँ श्रीकृष्ण की बांसुरी की दिव्य तान नित्य गुंजायमान हो रही है। [2]
यहाँ के वृक्ष, लताएँ और पवन भी ‘राधे-राधे’ की पुकार कर रहे हैं, जिससे जीव का हृदय स्वतः ही इस पावन भूमि की ओर आकृष्ट हो जाता है। [3]
जो कोई निष्कपट प्रेम-भाव से श्रीकृष्ण के दर्शन की आकांक्षा रखता हो, उसे आज भी वृंदावन की इस रसमयी भूमि में वह चित्तचोर सहज ही दृष्टिगोचर होता है। [4]

