सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (14)

सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (14)

(राग बसन्त)
सजनी नव निकुञ्ज द्रुम फूले।
अलि-कुल-संकुल करत कुलाहल,
सौरभ मनमथ मूले ॥ [1]
हरषि हिंडोरें रसिक रासि वर,
जुगल परस्पर झूले ।
श्री बीठलविपुल विनोद देखि नभ,
देव विमाननि भूले ॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (14)

वसंत ऋतु की अनुपम माधुरी का चित्रण करते हुए एक सखि अन्य से कहती है -
हे सखि! इस वसंत में नव-नव विकसित मधुरता से युक्त वृक्ष और लताएँ पूर्णतः खिल उठी हैं। इन पुष्पों से उदित सौरभ की रसमादकता ने पूरे वन को मोह लिया है, जिससे मत्त भ्रमरावलि गुंजार करती हुई प्रेम और आनंद का संचार कर रही है और वातावरण में मन्मथ (कामदेव) का अद्भुत उद्रेक हो रहा है। [1]

इस आनन्दमय वसंत में रसिकराज श्री बिहारी (श्रीकृष्ण) और बिहारिणी (श्रीराधा) परस्पर प्रेममग्न होकर हिंडोले में झूल रहे हैं। श्रीवृंदावन की इस रस-विनोद माधुरी का प्रकाश और उसकी ज्योति-छटा इतनी दिव्य है कि उसे देखकर आकाशस्थ देवगण स्वयं अपने शरीर-बोध को विस्मृत कर, प्रेमानंद में लीन हो रहे हैं। [2]