खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (21)

खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 3 (21)

(कवित्त)
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी,
उड़त गुलाल अनुराग कौ सुरंग री। [1]
मृदु मुसकानि उर फूल एई फूल भये,
हाव-भाव सौंधे भींजे सोहैं अँग-अंग री॥ [2]
नैननिं की चितवनि छिरकनि प्रेम-नीर,
सींचत हैं पिय-हिय भरी रस-रंग री। [3]
‘हित ध्रुव’ भींजे सुख बारिध विलास हॉँस,
सोई सुख देखैं सखी दिनहिं अभंग री॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (3.21)

नवल छबि धाम युगल आज ऋतुराज वसन्‍त आगमन पर होली का शुभारम्भ करते हुए अनुराग की गुलाल उड़ा रहे हैं । [1]

उनकी मन्द मधुर मुसकान एवं ह्दय का उल्लास ही पुष्प बन कर बरस रहा है। हाव-भाव रूपी सौरभी सार से भींगे हुए उनके श्री अंगों की छवि बड़ी मनमोहक है । [2]

प्रियाजी की प्रेम रस भरी चितवन ही सुरंग प्रेम जल का छिड़काव है; जिसके द्वारा रस रंग भरी प्रिया, प्रियतम के हृदय का सिंचन करती हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि हास-परिहास रूपी सुख वारिधि-विलास में श्री युगल सदैव रसोन्मत्त बने रहते हैं, सखियाँ उसी सुख का अक्षुण्ण भाव से सेवन करती हैं । [4]