नित नित होरी ब्रज में रहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)

नित नित होरी ब्रज में रहौ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)

नित नित होरी ब्रज में रहौ ।
विहरत हरि-सँग ब्रज-जुबतीगन, सदा अनन्द लहौ ॥ [1]
प्रफुलित फलित रहौ वृंदावन, मधुप कृष्ण-गुन कहौ।
‘हरीचंद' नित सरस सुधामय, प्रेम-प्रवाह चहौ ॥ [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)

नित्य धाम ब्रज में होली का उत्सव नित्य-नित्य ही मनाया जाता है, जहाँ श्री हरि ब्रज की युवतियों संग आनंदपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, और वे सदा दिव्य आनंद में मग्न रहती हैं। [1]

नित्य सुमंगलमय श्रीधाम वृंदावन सदा पुष्पित और फलित रहता है, जहाँ रसिकजन भँवरों की भाँति गुंजार करते हुए श्रीकृष्ण के गुणों का गान करते रहते हैं। श्री हरिचंद प्रार्थना करते हैं—‘ऐसी कृपा हो कि मेरा हृदय सदा उस अविरल, अमृतमयी प्रेम-रस-धारा का प्यासा बना रहे।’ [2]