रस लै तो द्वार पर्यो रहियो ।
जो तू रसिया रस को भूखो, मार धार सब की सहियो ॥ [1]
जइयो ना कहुँ इन द्वारन ते, लली चरनन को सुख पइयो ।
पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखै, प्रेम सुधा कौ रस चखियो ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है। [1]
कहीं और मत भटको, किसी अन्य के द्वार पर कभी मत जाना, श्री राधा के द्वार से ही तुमको तो श्रीराधा के चरणों का रस प्राप्त होगा। श्री पुरुषोत्तम जी कहते हैं—‘प्रभु की दिव्य छवि का दर्शन करो, और प्रेम सुधा का रसास्वादन करो।’ [2]
जो तू रसिया रस को भूखो, मार धार सब की सहियो ॥ [1]
जइयो ना कहुँ इन द्वारन ते, लली चरनन को सुख पइयो ।
पुरुषोत्तम प्रभु की छवि निरखै, प्रेम सुधा कौ रस चखियो ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
यदि तुम्हें वास्तविक रस का पान करना है तो किशोरीजी के द्वार पर ही अडिग पड़े रहना । यदि तुम सच्चे रसिक हो, तो समस्त कठिनाइयों और कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन करो, क्योंकि इसका फल (रस) अतुलनीय है। [1]
कहीं और मत भटको, किसी अन्य के द्वार पर कभी मत जाना, श्री राधा के द्वार से ही तुमको तो श्रीराधा के चरणों का रस प्राप्त होगा। श्री पुरुषोत्तम जी कहते हैं—‘प्रभु की दिव्य छवि का दर्शन करो, और प्रेम सुधा का रसास्वादन करो।’ [2]

