(सवैया)
नमो नमो श्रीहरिदास वृन्दाविपिन
वास वर प्रान सर्वस बांकेबिहारी। [1]
श्यामाश्याम जुगल रूप माधुर्य के
रसिक रिझवार प्रेम अवतारी॥ [2]
परम बैराग-निधि बसत निधिबन
सदा भावना लीन सुप्रवीण भारी। [3]
कामना कल्पतरु सकल संतापहरु
‘अग्रदास’ अलि कल्याणकारी॥ [4]
- श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)
जय हो स्वामी श्री हरिदास जी की! जो नित्य वृंदावन में ही विराजमान रहते हैं, और श्री बाँके बिहारी ही उनका सर्वस्व हैं। [1]
वे रसिकों के शिरोमणि, युगल माधुरी के अनन्य उपासक और प्रेम की साक्षात मूर्ति हैं। [2]
वे परम विरक्त अवस्था में सदा निधिवन में वास करते हैं। उनका चित्त निरंतर प्रेम भक्ति में तल्लीन रहता है, और वे युगल सरकार की सेवा में पूर्ण कुशलता से रमे रहते हैं। [3]
वे भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं, जिनकी छाया में सब दुख दूर हो जाते हैं। श्री अग्रदास जी कहते हैं — “स्वामी श्री हरिदास जी असीम करुणा के सागर और मंगलमयता के पुंज हैं।” [4]
नमो नमो श्रीहरिदास वृन्दाविपिन
वास वर प्रान सर्वस बांकेबिहारी। [1]
श्यामाश्याम जुगल रूप माधुर्य के
रसिक रिझवार प्रेम अवतारी॥ [2]
परम बैराग-निधि बसत निधिबन
सदा भावना लीन सुप्रवीण भारी। [3]
कामना कल्पतरु सकल संतापहरु
‘अग्रदास’ अलि कल्याणकारी॥ [4]
- श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)
जय हो स्वामी श्री हरिदास जी की! जो नित्य वृंदावन में ही विराजमान रहते हैं, और श्री बाँके बिहारी ही उनका सर्वस्व हैं। [1]
वे रसिकों के शिरोमणि, युगल माधुरी के अनन्य उपासक और प्रेम की साक्षात मूर्ति हैं। [2]
वे परम विरक्त अवस्था में सदा निधिवन में वास करते हैं। उनका चित्त निरंतर प्रेम भक्ति में तल्लीन रहता है, और वे युगल सरकार की सेवा में पूर्ण कुशलता से रमे रहते हैं। [3]
वे भक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं, जिनकी छाया में सब दुख दूर हो जाते हैं। श्री अग्रदास जी कहते हैं — “स्वामी श्री हरिदास जी असीम करुणा के सागर और मंगलमयता के पुंज हैं।” [4]

