प्रिया श्याम रूप रंग माती - श्री ठाकुर दास जी

प्रिया श्याम रूप रंग माती - श्री ठाकुर दास जी

प्रिया श्याम रूप रंग माती।
अंग अंग अनुराग बढ़ौ अति, सोभा कही न जाती॥ [1]
तन सौ तन मन सौ मन मिलवत, छाती सौ लगाई छाती।
ठाकुर सखी या छबि पर वारी, बार बार सुख पाती॥ [2]

- श्री ठाकुर दास, श्री ठाकुर दास जी की वाणी, पद (1)

दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे के अद्वितीय सौंदर्य एवं माधुर्य में पूर्णतः निमग्न हैं। उनके अंग-अंग से नित्य नवीन प्रेम की रसधारा प्रवाहित हो रही है, जिसकी अलौकिक शोभा का वर्णन करना असंभव है। [1]

वे तन से तन, मन से मन मिलाए हुए ऐसे गाढ़ आलिंगनबद्ध हैं मानो वे दो से एक हो रहे हैं । श्री ठाकुर सखी इस अद्भुत झलक पर बार-बार स्वयं को न्योछावर कर रही हैं और प्रेमानंद के अथाह सागर में डूबती चली जा रही हैं। [2]