न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.62)

न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.62)

न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके।
ब्रह्मेन्द्राद्यभिलषितं भाग्यं वृन्दावने वासः॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.62)

विषय-भोगों का बहुलता से सुलभ होना सौभाग्य नहीं है, संसार में कीर्ति का विस्तार हो जाए—यह भी सौभाग्य नहीं है। असली सौभाग्य है श्रीवृन्दावन वास प्राप्त हो जाए, जिसकी ब्रह्मा-इन्द्र आदि भी अभिलाषा करते हैं ।