गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (35)

गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (35)

गुरु राखै फूटौ करवा, लगावै रज ।
चेला रंगै बाँकी, बनावै सज॥

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (35)
 
यह कैसी विडंबना है कि वृंदावन के रसोपासक गुरुजन तो अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। वे फूटा हुआ करुआ रखते हैं, श्रीधाम वृंदावन की पावन रज को अपने तन-मन पर धारण करते हैं, और निष्कपट भक्ति में लीन रहते हैं।
परंतु उनके कुछ शिष्य (चेले) वृंदावन की रज को तुच्छ समझते हैं, उन्हें उससे कोई सरोकार नहीं। वे तो सज-धजकर, बनाव-श्रृंगार करके, बाह्य आडंबर में लिप्त रहते हैं।