नीरजनैंनी नागरी कलबैंनी सुकुँवारि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (75)

नीरजनैंनी नागरी कलबैंनी सुकुँवारि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (75)

(दोहा)
नीरजनैंनी नागरी, कलबैंनी सुकुँवारि।
श्रीहरि प्यारी नित हिये, बसहु सदा सुखकारि॥

(पद)
जय जय प्रिया प्राण-पिय प्यारी।
जय जय रूप उजारी राधे, अति सुन्दर सुकुंवारी॥ [1]
जय जय नीरजनैंनी नागरि, कलबैंनी कमला री।
जय जय श्रीहरिप्रिया हिये, नित बसौ सदा सुखकारी॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (75)

श्रीलालजू (श्री कृष्ण) की अत्यन्त अधीर अवस्था देखकर श्रीहरि प्रिया सखी जी श्री प्रियाजू (श्री राधा) से प्रार्थना करने लगी।

(दोहा)
हे कमल-सरीखे नेत्रों वाली नागरी (श्री राधा)! हे मृदुभाषिणी सुकुमारी जू! आप श्रीहरि की अत्यंत प्यारी हैं। अतः आप उनके हृदय से लगकर उन्हें सुख प्रदान करें।

(पद)
हे प्रिया ! प्रीतम को आप प्राणों से भी अधिक प्यारी हो आप की जय हो ! हे राधे ! हे अति सुन्दरि सुकुमारीजू! आपसे ही सब रूप का प्रकाश है, आपकी जय हो। [1] 

हे कमल सरीखे नेत्रों वाली नागरीजू ! हे मृदुभाषिणी पद्मनीजू आपकी जय हो। आप हरि की अत्यन्त प्यारी हैं, अतः उनका गाढ़ आलिंगन करके उनके हृदय में नित्य वसी रहें, एवं हर प्रकार से उनको सदा सुख प्रदान करें मेरी यही प्रार्थना है। [2]