हम बासी देस दिवाने के - श्री किशोरी अलि

हम बासी देस दिवाने के - श्री किशोरी अलि

(राग झँझोटी)
हम बासी देस दिवाने के। [1]
देवी देवन कौं नहीं माने, चाकर अजब अमाने के।
रहें हजूर लियें रूख सन्मुख, खास नीलांबर बाने के ॥ [2]
कौऊ कहै वनराज राज के, कौऊ कहैं बरसाने के।
राधा नाम भरोसे गाजें, बस नहिं राजा राने के ॥ [3]
वेद लोक की कान न मानैं, जानें जस उमंदाने के ।
“किशोरी” जू के ह्वैं कैं फिर नहिं, औरन हाथ बिकाने के ॥ [4]

- श्री किशोरी अलि

हम उस भूमि के वासी हैं, जहाँ के लोग दिव्य प्रेम रस में मग्न रहते हैं। [1]

हम किसी अन्य देवी देवताओं को नहीं मानते क्योंकि हम तो परम करुणामयी, अलबेली स्वामिनी श्री राधा के चाकर (दासी) हैं । हम सदा नीलांबर धारण करने वाली श्री राधा के ही अंग-संग रहते हैं, उन्हीं का पक्ष लेते हैं और उन्हीं की निज सेवा में रत रहते हैं। [2]

कुछ कहते हैं कि हम वृंदावन के हैं, कुछ कहते हैं कि हम बरसाना के हैं। परंतु हम ‘राधा नाम’ के भरोसे ही सदा गर्जना करते हैं, किसी राजा-रानी के वशीभूत नहीं हैं, क्योंकि हमारी एकमात्र अधीश्वरी तो स्वयं श्री राधा हैं। [3]

हम न लोक की रीति मानते हैं, न वेद की नीतियों में उलझते हैं—हम तो बस श्री राधारानी के यशोगान में सदा उन्मत्त रहते हैं।
श्री किशोरी अलि कहते हैं—“अब हम जब श्री राधा के हो चुके हैं, तो किसी और के हाथों बिकने वाले नहीं हैं। हमारा सर्वस्व अब केवल श्री राधा ही हैं।” [4]