लाज तजौ मसकत करो, यौ निर्वाह कराउं।
श्री वृन्दावन छांडि कै, अनत न कित हूँ जाउं॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (11)
मैं समस्त प्रकार की लज्जा का त्याग कर, चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न सहनी पड़ें, श्रमपूर्वक अपने जीवन का निर्वाह कर लूँगा, परंतु मैं वृंदावन को छोड़कर कभी कहीं और नहीं जाऊंगा।
श्री वृन्दावन छांडि कै, अनत न कित हूँ जाउं॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (11)
मैं समस्त प्रकार की लज्जा का त्याग कर, चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न सहनी पड़ें, श्रमपूर्वक अपने जीवन का निर्वाह कर लूँगा, परंतु मैं वृंदावन को छोड़कर कभी कहीं और नहीं जाऊंगा।

