लाड़िली ललचत है मन मेरो - श्री सरस माधुरी जी

लाड़िली ललचत है मन मेरो - श्री सरस माधुरी जी

(राग सोरठ)
लाड़िली ललचत है मन मेरो।
अविचल वास बसूँ बरसाने, नित निरखूं मुख तेरो॥ [1]
सेवा करूं कृपानिधि तेरी, रहूं चरण के नेरो।
सरस माधुरी छवि अवलोकूं, करों आपनों चेरो॥ [2]

- श्री सरस माधुरी

हे लाड़िली जी (श्री राधा)! मेरा मन सदैव आपके दर्शन के लिए लालायित रहता है। कृपा करके ऐसा वरदान दें कि मैं नित्य निरंतर बरसाने में वास करूँ और नित्य प्रति आपके मुखारविंद के दर्शन से अपने नेत्रों को तृप्त करता रहूँ। [1]

हे परम करुणामयी! मैं सदैव आपकी प्रेममयी सेवा में रत रहूँ और आपके चरण-कमलों के निकट रहने का सौभाग्य प्राप्त करूँ। श्री सरस माधुरी जी कहते हैं—“हे श्री राधे! मुझ पर अपनी कृपा बरसाइए, अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दीजिए और मुझे अपनी दासी रूप में स्वीकार कर लीजिए।” [2]