नीको लगे राधावर प्यारो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

नीको लगे राधावर प्यारो - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

नीको लगे राधावर प्यारो ।
मोर मुकुट पियरो पटुका है, लकुटी कर मतवारो॥ [1]
रोकत गैल छैल अलबेलो, नटवर वेष संवारो।
ललित किशोरी मोहन रसिया, जीवन प्राण हमारो॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

श्री राधावर (श्री कृष्ण) मेरे हृदय को अत्यंत प्रिय हैं। वे मोर मुकुट धारण किए, पीतांबर वस्त्रों से सुशोभित, हाथ में छड़ी लिए, अपनी मतवारी चाल से चलते हुए साक्षात रसिकराज प्रतीत होते हैं। उनकी चाल, उनकी छवि और उनकी लीला मन को मोहित कर लेने वाली है। [1]

वे अलबेले श्यामसुन्दर, नटवर वेश धारण कर, मार्ग में खड़े होकर गोपियों का मार्ग रोक लेते हैं और प्रेम से भरी मधुर लीलाएँ करते हैं। श्री ललित किशोरी जी कहते हैं—“वे रसिक मोहन ही मेरे प्राणों के आधार हैं।” [2]