प्रेम-पीर अति ही बिकल, कल न परत दिन रैन।
सुंदर स्याम सरूप बिन, 'दया' लहत नहिं चैन॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)
प्रेम रूपी विरह की पीड़ा ने मुझे इतना अधिक विकल कर दिया है कि न दिन में आराम मिलता है और न ही रात को। श्री दयाबाई कहती हैं—"जब तक मेरे नेत्र श्यामसुंदर के अनुपम रूप का दर्शन करके तृप्त नहीं हो जाते, तब तक मेरे हृदय को तनिक भी शांति नहीं मिलेगी।"
सुंदर स्याम सरूप बिन, 'दया' लहत नहिं चैन॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)
प्रेम रूपी विरह की पीड़ा ने मुझे इतना अधिक विकल कर दिया है कि न दिन में आराम मिलता है और न ही रात को। श्री दयाबाई कहती हैं—"जब तक मेरे नेत्र श्यामसुंदर के अनुपम रूप का दर्शन करके तृप्त नहीं हो जाते, तब तक मेरे हृदय को तनिक भी शांति नहीं मिलेगी।"

