खेलत मोहन राधा गोरी - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (976)

खेलत मोहन राधा गोरी - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (976)

(राग केदारो)
खेलत मोहन राधा गोरी।
इतहिं गोपिका जुरि-जुरि आईं, उतहिं ग्वाल मंडली चाँचरि जोरी ॥ [1]
पिय प्यारी पर प्यारी पिय पर, अबीर गुलाल की डारत झोरी।
“कृष्णदास” बलि जाइ इननि पर, स्यामा स्याम की जोरी॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (976)

श्री श्यामसुंदर हर्षोल्लास से भरकर श्री राधिका संग होली खेल रहे हैं। एक ओर गोपियों के दल उत्सुकता से जुटे हैं, तो दूसरी ओर ग्वालबालों का समूह चांचरी की ताल पर नृत्य एवं क्रीड़ा में मग्न है। [1]

प्यारी श्री राधा श्रीकृष्ण पर रंग बरसाती हैं, और श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक श्रीराधा पर अबीर व गुलाल उड़ा रहे हैं। श्री कृष्णदास कहते हैं—“मैं इस दिव्य श्यामा-श्याम की जोड़ी पर बलिहारी जाता हूँ!” [2]