वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह  - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)

वृन्दावन विहरहिं सदा गहे परस्पर बाँह - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)

वृन्दावन विहरहिं सदा, गहे परस्पर बाँह ।
लालच तिनके मिलन को, उपजि परो जिय माहिं ॥

- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)

दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण एक-दूसरे का आलिंगन कर सदा वृंदावन में नित्य विहार करते हैं। मेरे हृदय में उनसे मिलने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी है।