रँगन रंग हो हो होरी है - श्री लछिराम

रँगन रंग हो हो होरी है - श्री लछिराम

(सवैया)
रँगन रंग हो हो होरी है, कोऊ भलौ बुरौ जिनि मानौ ।
मनमोहन के मन मोहन कौं, श्री वृषभानु किशोरी है ॥ [1]
होरी में कहा कहा नहीं कहियत,यामैं कहा कुछ चोरी है ।
कृष्ण जीवन लछीराम के प्रभु सौं, जो कहियै सो थोरी है ॥ [2]

- श्री लछिराम

होली का उत्सव रंगों से सराबोर है, इसमें किसी बात का बुरा मानने का स्थान नहीं। जो स्वयं मनमोहन (श्रीकृष्ण) के हृदय को भी मोहित कर लें, वे कोई और नहीं, श्री वृषभानु-नंदिनी श्रीराधा ही हैं। [1]

होली में हास-परिहास और प्रेमभरे व्यंग्य स्वाभाविक रूप से झरते हैं — ऐसे सुखमय उत्सव में झिझक कैसी? श्री लछिराम के प्राणस्वरूप श्रीकृष्णचंद्र की महिमा का जितना गुणगान हो, उतना ही कम प्रतीत होता है। [2]