फाग की भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी - श्री पद्माकर

फाग की भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी - श्री पद्माकर

(सवैया)
फाग की भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी। [1]
भाय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी॥ [2]
छीन पितंबर कंमर तें, सुबिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी। [3]
नैन नचाय कह्यौ मुसक्याइ, लला! फिर खेलन आइयो होरी॥ [4]

- श्री पद्माकर

फाग की भीड़-भाड़ में जब अवसर मिला, तो श्री राधा गोरी ने श्रीकृष्ण को पकड़कर भीतर खींच लिया। [1]

फिर मनभायी लीला करते हुए, उन्होंने खूब अबीर-गुलाल को श्रीकृष्ण पर उड़ेल दिया। [2]

इसके पश्चात उन्होंने श्रीकृष्ण का पीतांबर और कंबल छीन लिया, और उनके कपोलों पर रोली का लेप लगा दिया। [3]

नयन इशारों से चिढ़ाते हुए, मुस्कुराकर रसरंगी भाव से श्री राधा बोलीं — “लाल! अब तू फिर खेलने आना होली!” [4]