होरी खेलैं श्यामा श्याम - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (808)

होरी खेलैं श्यामा श्याम - श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (808)

(राग रामकली)
होरी खेलैं श्यामा-श्याम।
दृग रंग भरि भृकुटी पिचकैं चलि मृदु मुसिकानि बाम॥ [1]
बाजत ताल मृदंग अंग संग वृन्दावन छवि धाम।
रूप सखी न्यौछावरि कीनौं कोटिन रति जुत काम ॥ [2]

- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (808)

श्री श्यामा-श्याम होली के आनंदमय रंगों में मग्न हैं, उनकी मोहक दृष्टियाँ प्रेम के रंगों में सराबोर हो रही हैं। कमान-सी टेढ़ी भौहें जल-वृष्टि करने वाली पिचकारी के समान, मधुर मुस्कान से युक्त, नयन-बाणों की वर्षा कर रही हैं। [1]

हर गति के साथ मृदंग की ताल लयबद्ध होकर गूंज रही है, और सम्पूर्ण वृंदावन अपने दिव्य सौंदर्य की पराकाष्ठा पर आलोकित है। श्री रूप सखी युगल सरकार के इन अनुपम दृश्यों को देखकर कोटि कोटि रति-कामदेवों की छटा को उनपर न्यौछावर कर रही हैं। [2]