वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (67)

वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (67)

(राग हमीर त्रिताल)
वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं।
सुन्दर यमुना प्रीतम प्यारी, प्यारी कदमन छाँहीं॥ [1]
वंशीवट सेबाकुञ्ज प्यारो, प्यारी चरण दवाँहीं।
चाल गयन्दिनि कुञ्जन विचरें, दिये युगल गलबाँहीं॥ [2]
वेणी गूँथे प्रीतम प्यारी, तन की सुध-बुध नाहीं।
निशिदिन अबतो श्रीगोपालहित, प्यारी के गुण गाईं॥ [3]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (67)

वृंदावन छोड़ कर कहीं भी आनंद नहीं है । मनोहर यमुना, सुंदरयुगल सरकार श्री प्रियतम-प्यारी (राधा-कृष्ण), एवं कदंब की छाया आदि अति मन मोहक है। [1]

वंशीवट के तट पर, सेवा कुंज में प्रियतम श्री कृष्ण प्रेमपूर्वक श्री राधा के चरणों को दबाते हैं । मदमस्त गजगामिनी युगल जोड़ी, वृंदावन की कुंजों में प्रेमालिंगन कर विहार करती है। [2]

श्री कृष्ण, श्री राधा के केशों की वेणी गूंथते हैं, ऐसे प्रेम में निमग्न होते हैं कि तन-मन की सुध-बुध खो बैठते हैं। अब, दिन-रात श्री हित गोपाल दास, अपनी प्यारीजू (श्री राधा) की लीलाओं में तन्मय होकर उनका गुणगान करते रहते हैं। [3]