मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

(राग झिंझोटी)
मोहि मति रोकै री तू, एरी ब्रज नागरी।
रूप की निधान है तू, गुणन की खान है तू,
तेरी सम कौन आज, तेरो बड़ो भाग री॥ [1]
कहै तो मैं नृत्य करूँ, बांसुरी में राग भरूं,
कान्हरो किदारो भैरों, सोरठ बिहाग री।
तू तो सदा उपकारी, हित की करनहारी,
आज नारायण मोसों, क्यों राखै तू लाग री॥ [2]

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)

जब श्री कृष्ण माननी श्री राधा से मिलने पहुंचते हैं तो श्री राधा की एक सखी उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक देती हैं ।
(श्री कृष्ण सखी से कहते हैं) -

हे ब्रज-नागरी, मुझे श्री राधा से मिलने से मत रोक!  तू तो रूप की निधान है, गुणों की खान है, आज तेरी समानता कौन कर सकता है ? तू तो परम भागशाली है । [1]

यदि तू कहे तो मैं नृत्य करूँ, तू कहे तो मैं भैरव, कान्हरौ, केदारौ, सोरठ, विहाग, आदि रागों में बांसुरी बजाऊँ। 
तू तो सदा उपकार करने वाली है, मेरा हित करने वाली है, तो आज मुझे क्यों भीतर प्रवेश करने से रोक रही है ? [2]