रीझि परे छवि धाम पर, करि नौंछावरि देह।
तब तिय सुत धन आदि दैं, पूछै को तुझ गेह॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (20)
जब कोई जीव श्री वृंदावन धाम से रीझकर स्वयं को श्रीधाम पर न्योछावर कर देता है, तब स्त्री, पुत्र, धन, घर आदि की आसक्ति उसे परम तुच्छ प्रतीत होने लगती है।
तब तिय सुत धन आदि दैं, पूछै को तुझ गेह॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (20)
जब कोई जीव श्री वृंदावन धाम से रीझकर स्वयं को श्रीधाम पर न्योछावर कर देता है, तब स्त्री, पुत्र, धन, घर आदि की आसक्ति उसे परम तुच्छ प्रतीत होने लगती है।

