शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (76)

शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (76)

(कवित्त)
शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं,
भक्ति न प्रह्लाद सी राम राम कहने की। [1]
अम्बरीष तुल्य दृढ़ व्रत का नियम नहीं,
हरिश्चन्द्र सी न दृढ़ता कष्ट सहने की॥ [2]
मोरध्वज जैसा मुझे धर्म का भी प्रेम-नहीं,
श्रद्धा नहीं सूर सी प्रेम-पथ गहने की। [3]
आराधना न और कोई कर सकता नाथ,
साधना एक मेरी वृन्दावन रहने की॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (76)

नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ। [1]

राजा अंबरीष के समान किसी दृढ़ व्रत का पालन करने की शक्ति भी नहीं है, और न ही हरिश्चंद्र के समान कष्ट सहने की दृढ़ता रखता हूँ। [2]

मोरध्वज के समान धर्म के प्रति प्रेम भी नहीं है, और न ही सूरदास जी के समान इस प्रेम पंथ में अटूट श्रद्धा है। [3]

हे नाथ! मैं अन्य कोई साधना नहीं कर सकता, मेरी एकमात्र साधना तो बस श्री वृंदावन धाम में वास करने की ही है। [4]