श्री श्यामा जू को श्याम पलोटत पाम - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (49)

श्री श्यामा जू को श्याम पलोटत पाम - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (49)

श्री श्यामा जू को, श्याम पलोटत पाम ।
ब्रह्म सच्चिदानंद नंदसुत, जेहि कह पूरनकाम ॥ [1]
कोमल कमल लली पग लाली, लखि बेहाल सोइ श्याम ।
बलि-बलि जात लगावत निज दृग, निज कर-कमल ललाम ॥ [2]
कबहुँक हरि निज उर लपटावत, चरन कमल अभिराम ।
मृदु मुसकाय 'कृपालु' विलोकति, लतन ओट ब्रजबाम ॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (49)

श्री श्यामा जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्यामसुन्दर दबाया करते हैं । जिन्हें वेदों ने पूर्णकाम सच्चिदानंद ब्रह्म बताया है, वही ब्रह्म नन्दनन्दन बनकर अवतीर्ण हुए हैं । [1]

वही नन्दनन्दन किशोरी जी के अतिशय सुकोमल, अरुण चरण कमलों की लालिमा को देखकर विभोर हो जाते हैं । कभी अपने कर कमलों से उन चरण कमलों को अपनी आँखों में लगाते हुए बलिहार जाते हैं । [2]

कभी उन चरण कमलों को श्यामसुन्दर अपने ह्रदय से लगाते हैं । ‘श्री कृपालु जी ' कहते हैं कि इस बाँकी - झाँकी को ब्रजागनाएँ लताओं की ओट से, मन्द-मन्द मुस्कराती हुई निहारती हैं । [3]