बनि दुकूल बैठे परजंक - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17)

बनि दुकूल बैठे परजंक - श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17)

(राग विहागरौ)
बनि दुकूल बैठे परजंक ।
कमल नैंन अंग छवि निरखत, प्यारी भरे जू अंक ॥ [1]
धन्य धन्य पिय मानि अपनपौ, ज्यौं निधि पाये रंक ।
श्रीरसिकबिहारी यह सुख विलसत, तहाँ निकट निसंक ॥ [2]

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (17)

दोनों प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) रेशमी वस्त्रों से सुशोभित होकर साथ बैठे हैं। कमल-से नेत्रों से एक-दूजे को निहारते हैं और प्यारीजू (श्री राधा) अपने प्रियतम को प्रेम-सुख में भरकर आलिंगन करती हैं। [1]

प्रियतम अपने को धन्य-धन्य मानते हुए कृतार्थ हो उठे मानो कोई निर्धन अकस्मात महान खजाना पा गया हो। श्री रसिक देव कहते हैं कि निकुंज-महल में बिहारी-बिहारिनी निशंक (निसंकोच) भाव से प्रेम-विलास करते हैं । [2]