प्यारी नख चन्दन कौं कीजिये चकोर मन - श्री प्रेम दास जी की वाणी (93)

प्यारी नख चन्दन कौं कीजिये चकोर मन - श्री प्रेम दास जी की वाणी (93)

(कवित्त)
प्यारी नख चन्दन कौं कीजिये चकोर मन,
राधे गुन गानन कौं पिक कर दीजिये। [1]
फूले पद कंजन कौं करिये मधुप मोई,
बिरद बखाननबै कौं कोइल करीजिये॥ [2]
कीजिये मराल जो पै दीजै गति आप प्यारी,
कैकी कर केल रेल श्याम घन भीजिये। [3]
कीजै द्रुम बेली बाग श्रीवन निकुंजन में,
प्रेमसखी तू ही धनी भावै तैसी कीजिये॥ [4]

- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (93)

ऐसी कृपा हो कि मेरा मन प्यारीजू (श्री राधा) के नख-चंद्रिका में चकोर बन जाए, या मुझे राधेजू के मधुर यश का निरंतर गान करने वाली कोयल बनने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए। [1]

श्री राधा के चरणकमलों के समीप मँडराने वाला मधुप बनने का सौभाग्य मिल जाए, या उनके गुणों का मधुर वाणी से गान करने वाली कोकिला बनने का वरदान प्राप्त हो जाए। [2]

हे प्यारीजू! मुझे वह मराल बना दो जो आपकी गति से आपकी मृदुल चाल के पीछे-पीछे चले, या वह मोर जो श्यामसुंदर के संग आपके नित्य विहार को निरंतर निहारे। [3]

मुझे श्रीवृंदावन के निकुंज-वन का वृक्ष, लता या कुंज बनने का सौभाग्य मिल जाए। श्री प्रेम सखी प्रार्थना करती हैं—हे प्यारीजू! आप ही रस की अथाह सागर हैं, मुझे वही बना दीजिए जो आपके हृदय को प्रिय लगे । [4]