लगी मेरी मदन मोहन से यारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (136)

लगी मेरी मदन मोहन से यारी - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (136)

(राग श्यामकल्याण व भैरव)
लगी मेरी मदन मोहन से यारी।
मुकुट लटक अटकी उर अन्तर, सबते सुरता टारी ॥ [1]
बसी रहै नित नैन रूप छवि, पल छिन रहूँ मतवारी।
“रूपमाधुरी” गुरु कृपा सों, जग सुख सकल विसारी ॥ [2]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (136)

मेरी मदन मोहन (श्रीकृष्ण) से एक अंतरंग यारी बन गई है। उनके टेढ़े मुकुट की लटक मेरे हृदय में ऐसे बस गई है कि अब उनके अतिरिक्त मेरी किसी और से लगन ही नहीं रही। [1]

उनकी सुंदर छवि मेरी आँखों में सदैव के लिए बस गई है, और हर क्षण मैं उसी दर्शन में मतवाली बनी रहती हूँ। श्री रूप माधुरी कहते हैं—गुरुदेव की कृपा ने मेरे हृदय से समस्त सांसारिक सुख पाने की लालसा को ही नष्ट कर दिया है। [2]