जो अपने औगुन कहौं, पाऊँ ओर न छोर - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (8)

जो अपने औगुन कहौं, पाऊँ ओर न छोर - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (8)

जो अपने औगुन कहौं, पाऊँ ओर न छोर ।
अन्तर की जानौ सबै, स्यामा कहौ निहोर ॥

- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केलि माधुरी, श्री राधा करुणावली (8)

हे श्यामा जू (श्री राधा)! यदि मैं अपने दोषों को गिनाना आरंभ करूँ, तो उनकी कोई गिनती ही नहीं है, वे तो अनंत हैं। किंतु आप तो मेरे अंतरतम हृदय की हर बात को जानने वाली सर्वज्ञा स्वामिनी हैं। इसलिए मैं केवल आपसे ही कृपा की याचना करता हूँ। आपकी अकारण कृपा से ही मेरी बिगड़ी बात बनेगी।