रूप भरे रँग भरे मधुस्मित गन्ध भरे - श्री प्रेम जी

रूप भरे रँग भरे मधुस्मित गन्ध भरे - श्री प्रेम जी

(कवित्त)
रूप भरे रँग भरे, मधुस्मित गन्ध भरे,
भरे मकरन्द मुखपंकज में पागि रहे। [1]
मद भरे मोद भरे, मोरपंख शीश धरे,
कारे घुँघरारे कच कपोलन पै लागि रहे॥ [2]
लाड़ भरे लोभ भरे, लोचन वे लोच भरे,
करैं चुगल छिनहिं श्रुति मूल भागि रहे। [3]
“प्रेम” चित बिषे भरे, जाय रस सबै मरे,
ऐसो धाम श्याम कोऊ मेरे उर जागि रहे॥ [4]

- श्री प्रेम जी

जिनका मुख कमल मधुर से भी अधिक मधुर, अमृत से भी अधिक सुस्वादु है, जो रूप, रंग और माधुर्य से पूर्ण है। [1]

जिनके मुख पर गौरव की प्रभा है, और जो आनंद के उन्माद में अभिभूत हैं। उनके सिर पर मोर मुकुट अत्यंत शोभायमान है, और उनके घुंघराले, काले केश उनके कोमल कपोलों पर लहराते हुए सौंदर्य की अनुपम छटा बिखेरते हैं।[2]

उनकी आँखें स्नेह, लोभ और भावों से परिपूर्ण हैं—एक दृष्टि ही वेदों के सार को प्रकट कर देती है। उन नेत्रों की रहस्यमयी गहराई में प्रेम का अमृत छलकता है। [3]

प्रेम जी कहते हैं—“मेरा हृदय उन्हीं झलकियों से भर गया है, जिनकी मधुरता का रस सभी सांसारिक सुखों की लालसा को मिटा चुका है। ऐसे श्री श्यामसुंदर, आनंद के धाम, मेरे हृदय में जागृत हो उठे हैं।” [4]