तैं जो रतन पायौ भलौ जान्यौ साधि न साज - श्री सूरदास, सूर सागर

तैं जो रतन पायौ भलौ जान्यौ साधि न साज - श्री सूरदास, सूर सागर

तैं जो रतन पायौ भलौ, जान्यौ साधि न साज।
प्रेम कथा अनुदिन सुनै, तऊ न उपजै लाज॥

- श्री सूरदास, सूर सागर

तूने मनुष्य देह रूपी अनमोल रत्न पाया, किंतु उसका उपयोग करना तूने नहीं जाना। अरे, प्रतिदिन प्रेम की कथा सुनता है, फिर भी अपनी प्रेम हीनता पर लज्जा नहीं उत्पन्न होती।