यह रस-रीति प्रिया-प्रियतम की, दिब्य स्वॉति-जल जैसें ।
बिसयी, ज्ञानी, भक्त, उपासक, प्रापत सबकौं कैसैं॥
कदली, कमल, पपीहा, सीपी पात्र-भेद गुन तैसैं।
भगवत बीज विसमता नाहीं, भूमि भाग्य फल ऐसैं॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.7)
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है। जैसे पात्र भेद गुण के कारण स्वाति जल कदली में कपूर, कमल में पराग, पपीहा पक्षी में जीवन प्राण और सीपी में मोती बन जाता है, उसी प्रकार भाव रूपी पात्र के कारण यह रस रीति भी विषयी, ज्ञानी, भक्त तथा रसिक में पात्र–गुण के अनुकूल स्वरूप धारण कर लेती है। विषयी इसमें विषय देख लेता है, ज्ञानी ज्ञान ढूँढ लेता है, भक्त भक्ति-विभोर हो जाता है और रसिक रस में डूब जाता है। अतः भगवतरसिक जी कहते हैं कि विश्व ब्रह्माण्ड में जितना भी सुख है, उसका बीज तो यही है श्यामा-कुंजविहारी का नित्यविहार ही है, परन्तु भूमि के भेद (हृदय की पात्रता) के अनुसार फलित होता दिखाई देता है। इसलिए नित्यविहार रसोपासना का उपासक बनने के लिए उस रस की पात्रता प्राप्त करना यानी रसिक बन जाना परम आवश्यक है।
बिसयी, ज्ञानी, भक्त, उपासक, प्रापत सबकौं कैसैं॥
कदली, कमल, पपीहा, सीपी पात्र-भेद गुन तैसैं।
भगवत बीज विसमता नाहीं, भूमि भाग्य फल ऐसैं॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.7)
प्रिया प्रीतम की यह दिव्य रस रीतिः नित्यविहार रस स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के समान दिव्य और फलदायी है। जैसे पात्र भेद गुण के कारण स्वाति जल कदली में कपूर, कमल में पराग, पपीहा पक्षी में जीवन प्राण और सीपी में मोती बन जाता है, उसी प्रकार भाव रूपी पात्र के कारण यह रस रीति भी विषयी, ज्ञानी, भक्त तथा रसिक में पात्र–गुण के अनुकूल स्वरूप धारण कर लेती है। विषयी इसमें विषय देख लेता है, ज्ञानी ज्ञान ढूँढ लेता है, भक्त भक्ति-विभोर हो जाता है और रसिक रस में डूब जाता है। अतः भगवतरसिक जी कहते हैं कि विश्व ब्रह्माण्ड में जितना भी सुख है, उसका बीज तो यही है श्यामा-कुंजविहारी का नित्यविहार ही है, परन्तु भूमि के भेद (हृदय की पात्रता) के अनुसार फलित होता दिखाई देता है। इसलिए नित्यविहार रसोपासना का उपासक बनने के लिए उस रस की पात्रता प्राप्त करना यानी रसिक बन जाना परम आवश्यक है।

