राधे दै बृंदावन-बास - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)

राधे दै बृंदावन-बास - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)

(राग सारंग- चौताला)
राधे दै बृंदावन-बास ।
तेरो ह्वै मन पनिहि परि रहै, तनहूँ ताही पास ॥ [1]
महामधुर रसकेलि-माधुरी, फुरै हियै अनयास ।
हरी खरी सुखभरी निकुंजै, नौ नौ रंग-बिकास ॥ [2]
जमुना-तीर ललित बंसी-धुनि, अदभुत अमी-निवास ।
कृपा-रमँड घमँडनि आनँदघन, बेगि पुरियैं आस ॥ [3]

- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (372)

हे श्रीराधे! कृपा करके मुझे श्रीवृंदावन में निवास प्रदान कीजिए। मेरा मन उसी प्रकार आप में स्थिर बना रहे, जैसे कोई पनिहारिन अपने सिर पर मटका रखे चलती है— सखियों से हँस-बोल भी रही होती है, पर उसका ध्यान सदा मटकी पर ही टिका रहता है। ऐसी कृपा हो कि मेरा यह तन भी आपकी सेवा में निरंतर लगा रहे। [1]

मेरे हृदय में सहज रूप से युगल सरकार (श्री राधा कृष्ण) की रस-केलियों की मधुर लीलाएँ उमड़ती रहें। हरी-भरी, आनंदमयी नवल-निकुंजों की रंगीन छटा मेरे अंत:करण को निरंतर प्रकाशित करती रहे। [2]

यमुना के तट पर, जहाँ श्रीकृष्ण की मनमोहक बाँसुरी की तान सदा गूँजती रहती है, वहीं एक अमृतमयी, अद्भुत धाम विद्यमान है। हे श्रीराधे! शीघ्र कृपा की वर्षा कीजिए श्रीवृंदावन में वहीं वास प्रदान कर, मेरी इच्छा को सफल कीजिए । [3]