(राग रामकली)
लोचन भए स्याम के चेरे।
ऐते पै सुख पावत कोटिक, मोतन फेरि न हेरे॥ [1]
हाहा करत परत हरि चरननि, ऐसे बस भए उन्हीं।
उनको बदन विलोकत निसि-दिन, मेरौ कह्यो न सुनहीं ॥ [2]
ललित त्रिभंगी छवि पर अटके, फटके मोसौं तोरी।
'सूर' दसा यह मेरी कीन्ही, आपुन हरि सौं जोरि॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं। [1]
मैंने इन नेत्रों से बहुत प्रार्थना की, हरि चरणों में भी विनती की, परंतु अब ये श्यामसुंदर के मुख के वशीभूत हो चुके हैं। ये उनके ही रूप का सदा अवलोकन करते रहते हैं, पर मेरा कहना बिल्कुल नहीं मानते। [2]
उनके ललित त्रिभंगी रूप में ऐसे फँसे हैं कि मुझसे सारा नाता तोड़कर, मुझे फटकार कर, पूरी तरह मुझसे विलग हो गए हैं। श्री सूरदास कहते हैं—इन नेत्रों ने श्यामसुंदर से अपना नाता जोड़कर मेरी ऐसी दशा कर दी है। [3]
लोचन भए स्याम के चेरे।
ऐते पै सुख पावत कोटिक, मोतन फेरि न हेरे॥ [1]
हाहा करत परत हरि चरननि, ऐसे बस भए उन्हीं।
उनको बदन विलोकत निसि-दिन, मेरौ कह्यो न सुनहीं ॥ [2]
ललित त्रिभंगी छवि पर अटके, फटके मोसौं तोरी।
'सूर' दसा यह मेरी कीन्ही, आपुन हरि सौं जोरि॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं। [1]
मैंने इन नेत्रों से बहुत प्रार्थना की, हरि चरणों में भी विनती की, परंतु अब ये श्यामसुंदर के मुख के वशीभूत हो चुके हैं। ये उनके ही रूप का सदा अवलोकन करते रहते हैं, पर मेरा कहना बिल्कुल नहीं मानते। [2]
उनके ललित त्रिभंगी रूप में ऐसे फँसे हैं कि मुझसे सारा नाता तोड़कर, मुझे फटकार कर, पूरी तरह मुझसे विलग हो गए हैं। श्री सूरदास कहते हैं—इन नेत्रों ने श्यामसुंदर से अपना नाता जोड़कर मेरी ऐसी दशा कर दी है। [3]

