प्राणजीवन के नेह में, तन मन से रहे चूर ।
घर में कै बन में रहैं, सोई रसिकजन सूर ॥
- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (10)
जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन सदैव प्रेम में ही मगन रहता है।
घर में कै बन में रहैं, सोई रसिकजन सूर ॥
- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (10)
जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन सदैव प्रेम में ही मगन रहता है।

