(राग परज व खम्माच)
मो सम कौन कुटिल अविचारी ।
जिंहिं रसना रस नाम त्याग के, निशिदिन बातें बकत लबारी ॥ [1]
जे अखियाँ तज युगल रूप रस, छकी रहत नित नेह सुत-नारी ।
जे कर दम्पति चरण पलोटत, लगे हरन परधन दुख भारी ॥ [2]
निशिदिन आस वास वृन्दावन, रूप सुधारस पीवौं प्यारी ।
कृपा दृष्टि दुख हेरो मो तन, ललित लड़ैती शरण तिहारी ॥ [3]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (11)
मुझसे अधिक कुटिल और अविचारी कौन होगा? जिसकी जिह्वा अमृतमय नाम का त्याग करके, दिन-रात व्यर्थ की बातें करती रहती है। [1]
जिसके नेत्र युगल की मधुर छवि के दर्शन को त्याग कर सांसारिक पुत्र-नारी के नेह में ही छकी रहती हैं । ये हाथ, जो श्री युगल चरणों की सेवा में लगने चाहिए थे, दूसरे के धन को लूटने में लगे रहकर पाप कमा रहे हैं । [2]
अब मेरी एकमात्र आशा यही है कि मैं श्री वृंदावन में वास कर सकूँ और प्यारीजू (श्री राधा) की छवि का सतत पान कर अपना जीवन सफल बना सकूँ । श्री ललित लड़ैती कहते हैं - “हे मनोहारनी लड़ैती जू (श्री राधे)! मैं आपकी शरण में हूँ! अपनी कृपा दृष्टि से मेरे दुखों का हरण कर लो ।" [3]
मो सम कौन कुटिल अविचारी ।
जिंहिं रसना रस नाम त्याग के, निशिदिन बातें बकत लबारी ॥ [1]
जे अखियाँ तज युगल रूप रस, छकी रहत नित नेह सुत-नारी ।
जे कर दम्पति चरण पलोटत, लगे हरन परधन दुख भारी ॥ [2]
निशिदिन आस वास वृन्दावन, रूप सुधारस पीवौं प्यारी ।
कृपा दृष्टि दुख हेरो मो तन, ललित लड़ैती शरण तिहारी ॥ [3]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (11)
मुझसे अधिक कुटिल और अविचारी कौन होगा? जिसकी जिह्वा अमृतमय नाम का त्याग करके, दिन-रात व्यर्थ की बातें करती रहती है। [1]
जिसके नेत्र युगल की मधुर छवि के दर्शन को त्याग कर सांसारिक पुत्र-नारी के नेह में ही छकी रहती हैं । ये हाथ, जो श्री युगल चरणों की सेवा में लगने चाहिए थे, दूसरे के धन को लूटने में लगे रहकर पाप कमा रहे हैं । [2]
अब मेरी एकमात्र आशा यही है कि मैं श्री वृंदावन में वास कर सकूँ और प्यारीजू (श्री राधा) की छवि का सतत पान कर अपना जीवन सफल बना सकूँ । श्री ललित लड़ैती कहते हैं - “हे मनोहारनी लड़ैती जू (श्री राधे)! मैं आपकी शरण में हूँ! अपनी कृपा दृष्टि से मेरे दुखों का हरण कर लो ।" [3]

