श्रीवृन्दावन रस सुधा सिंधु निमज्जत जोय - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (81)

श्रीवृन्दावन रस सुधा सिंधु निमज्जत जोय - श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (81)

श्रीवृन्दावन रस सुधा, सिंधु निमज्जत जोय।
ताको तीनो ताप को, कबहु ताप नहिं होय ॥

- श्री रामराय, गीत गोविंद ब्रज भाषा, दोहा (81)

जो व्यक्ति स्वयं को श्री वृंदावन रस रूपी अमृत-सागर में पूर्णतः डुबो देता है, उसे फिर कभी दैहिक, दैविक और भौतिक त्रितापों का स्पर्श नहीं होता।