जो मन नारि की ओर निहारत - श्री सुंदर जी

जो मन नारि की ओर निहारत - श्री सुंदर जी

(सवैया)
जो मन नारि की ओर निहारत, तौ मन होत है ताहि को रूपा। [1]
जो मन काहु सो क्रोध करै जब, क्रोधमई हो जाइ तदरूपा ॥ [2]
जौ मन माया ही माया रटे नित, तौ मन डूबत माया के कूपा। [3]
सुन्दर जौ मन ब्रह्म विचारत, तौ मन होत है ब्रह्मस्वरूपा॥ [4]

- श्री सुंदरदास जी

जिस मन की दृष्टि बार-बार स्त्री की ओर जाती है, वह धीरे-धीरे उसी रूप में ढलने लगता है। [1]

जो मन क्रोध करता है, वह स्वयं भी क्रोध का ही स्वरूप बन जाता है। [2]

जो मन निरंतर माया में रमा रहता है, वह अंततः उसी माया के अंधे कुएँ में गिर जाता है। [3]

श्री सुंदर दास कहते हैं कि उसी प्रकार यदि मन परब्रह्म का स्मरण और चिंतन करता है, तो वह स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है। [4]