सुत तिय गृह धन राज्य हू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (7)

सुत तिय गृह धन राज्य हू - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (7)

सुत तिय गृह धन राज्य हू, या में सुख कछु नाहिं ।
परमानंद प्रकास एक, कृष्ण-चरन के माहिं ॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (7)

पुत्र, पत्नी, घर, धन एवं राज्य आदि में सच्चा सुख नहीं है। परम आनंद केवल श्रीकृष्ण के चरणों में ही प्राप्त होता है।