(छप्पय)
जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी।
अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी॥ [1]
गान कला गन्धर्व, श्याम श्यामा कौं तोषैं।
उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं॥ [2]
नृपति द्वार ठाड़े रहैं, दरसन आसा जास की।
(श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥ [3]
- श्री नाभादास जी, भक्तमाल (91)
स्वामी श्री हरिदास जी का वर्णन करते हुए श्री नाभादास जी कहते हैं -
श्री स्वामी हरिदास जी का अटल नियम था कि युगल नाम के चिंतन में सदा रहते थे एवं श्यामा कुंजबिहारी को नित्य ही प्रेम से लाड़ लड़ाते थे । वे नित्य श्री राधा कृष्ण की परम अंतरंग केली का ही सदा अवलोकन करते थे, एवं श्री राधा की सखी भाव के रस का पान करते थे। [1]
संगीत में उनकी अद्भुत सिद्धि ऐसी थी कि उनके गायन से युगल सरकार परम तृप्त होते, और गान कला में अति निपुण स्वर्गीय गंधर्व भी उनके सामने तुच्छ प्रतीत होते।
वे प्रतिदिन विविध प्रकार के भोग अर्पित करते, और उसका प्रसाद प्रेमपूर्वक वृंदावन के मोर, बंदर, और जलचर जीवों को भी वितरित करते। [2]
निधिवन में निवास करते हुए उनकी महिमा ऐसी थी कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके कुटीर के बाहर केवल एक दर्शन के लिए प्रतीक्षा करते।
श्री आशुधीर जी की पावन परंपरा की गरिमा को उजागर करते हुए, स्वामी हरिदास जी समस्त रसिकों में चूड़ामणि हैं—वो श्री राधा-कृष्ण की प्रेम रस के सर्वोच्च आचार्य हैं। [3]
जुगल नाम सौं नेम, जपत नित कुंजबिहारी।
अवलोकत रहैं केलि, सखी सुख के अधिकारी॥ [1]
गान कला गन्धर्व, श्याम श्यामा कौं तोषैं।
उत्तम भोग लगाय, मोर मरकट तिमि पोषैं॥ [2]
नृपति द्वार ठाड़े रहैं, दरसन आसा जास की।
(श्री) आसुधीर उद्योतकर, रसिक छाप हरिदास की॥ [3]
- श्री नाभादास जी, भक्तमाल (91)
स्वामी श्री हरिदास जी का वर्णन करते हुए श्री नाभादास जी कहते हैं -
श्री स्वामी हरिदास जी का अटल नियम था कि युगल नाम के चिंतन में सदा रहते थे एवं श्यामा कुंजबिहारी को नित्य ही प्रेम से लाड़ लड़ाते थे । वे नित्य श्री राधा कृष्ण की परम अंतरंग केली का ही सदा अवलोकन करते थे, एवं श्री राधा की सखी भाव के रस का पान करते थे। [1]
संगीत में उनकी अद्भुत सिद्धि ऐसी थी कि उनके गायन से युगल सरकार परम तृप्त होते, और गान कला में अति निपुण स्वर्गीय गंधर्व भी उनके सामने तुच्छ प्रतीत होते।
वे प्रतिदिन विविध प्रकार के भोग अर्पित करते, और उसका प्रसाद प्रेमपूर्वक वृंदावन के मोर, बंदर, और जलचर जीवों को भी वितरित करते। [2]
निधिवन में निवास करते हुए उनकी महिमा ऐसी थी कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके कुटीर के बाहर केवल एक दर्शन के लिए प्रतीक्षा करते।
श्री आशुधीर जी की पावन परंपरा की गरिमा को उजागर करते हुए, स्वामी हरिदास जी समस्त रसिकों में चूड़ामणि हैं—वो श्री राधा-कृष्ण की प्रेम रस के सर्वोच्च आचार्य हैं। [3]

