लट छूटी त्रिय शीशते, रही कपोलन छाय ।
मानौ छौना नागकौ, पी पी अमी अघाय ॥
- ब्रज के दोहे
ठाकुर जी कहते हैं - श्री प्रिया जी की घुँघराली लटें उनके मुखकमल से इस प्रकार लिपटी रहती हैं, मानो सर्प के शिशु अमृतरस का पान कर तृप्त हो रहे हों।
मानौ छौना नागकौ, पी पी अमी अघाय ॥
- ब्रज के दोहे
ठाकुर जी कहते हैं - श्री प्रिया जी की घुँघराली लटें उनके मुखकमल से इस प्रकार लिपटी रहती हैं, मानो सर्प के शिशु अमृतरस का पान कर तृप्त हो रहे हों।

