स्याम सब ही के जिय की जानत हैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (107)

स्याम सब ही के जिय की जानत हैं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (107)

स्याम सब ही के जिय की जानत हैं।
करत भक्ति व्यौपार लोभ लगि, ताहि कहा कछु मानत हैं॥
अन्तरजामी सबके स्वामी, सहज प्रीति पहिचानत हैं।
श्रीबिहारिजी दास निहकामनि मन की रति, श्रीमुख बरनि बखानत हैं॥

- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (107)

सबके स्वामी और सबके भीतर विराजमान श्रीबांके बिहारीजी सबके हृदय की बात भली भाँति जानते हैं । वे प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में उठने वाले सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव और विचार को भी जानते हैं। जो आसक्ति, लोभ-ग्रस्त होकर भक्ति का व्यापार करते है, उन्हें वे कुछ नहीं मानते। परंतु उन भक्तों की भक्ति की प्रशंसा अपने श्री मुख से करते हैं एवं उनका वे यशोगान करते नहीं अघाते, जो निष्काम भाव से उन्हें प्यार करते हैं।