प्रीति की बाजी खेलिये प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (104)

प्रीति की बाजी खेलिये प्यारी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (104)

प्रीति की बाजी खेलिये प्यारी॥
हौं तौ काची प्रीति लै आई, साँची प्रीति लाउ सुकुँवारी।
हौं तौ बाजी अवसि हारिहौं, जीति करौ निज आज्ञाकारी ॥ [1]
ऐसी चेरी करौ आपनी, छिन न हौंउ चरणन तैं न्यारी।
तेरी सहज दान पर 'भोरी', बार-बार जाऊँ बलिहारी ॥ [2]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (104)

हे प्यारी जू! आप मेरे साथ प्रीति की बाजी लगायें। मैं यह जानती हूँ कि मेरी प्रीति कच्ची और आपकी प्रीति सच्ची है; अतः मेरा हारना और आपका जीतना निश्चित ही है। मैं आपसे निवेदन करती हूँ कि आप बाजी जीतकर मुझे अपनी आज्ञा पालन करने वाली दासी बना लें। [1]

मुझे आप ऐसी अनन्य सेविका बना लें कि मैं एक क्षण के लिये भी आपसे अलग न हो पाऊँ। श्रीहित भोरी सखी जी कहती हैं कि आपके इस कृपा पूर्ण दान पर मैं अपने आप को आपके ऊपर बार-बार न्यौछावर करती हूँ। [2]