निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.63)

निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.63)

निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति तत्त्वं विबुधास्तथास्तु ।
मया तु वृन्दावनमेव तत्त्वं सुनिश्चितं श्रीपदभूषिताङ्गम्॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.63)

विद्वान् लोग परम तत्त्वको निरञ्जन, निर्गुण और अद्वितीय बताया करते है; उनके लिये वह तत्त्व वैसा ही हो। परंतु मैंने तो अपने लिये श्रीवृन्दावनको ही परम तत्त्व निश्चित किया है; क्योंकि उसका श्रीअंग श्रीराधा के श्रीचरण-चिह्नोंसे भूषित है ।