पाँयन परि बिनती करै, से रस मुख्य सिंगार ।
मान छोडि मृदु बचन कहि, करुना रस निरधार ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.8)
लालजी (श्रीकृष्ण) जब श्री प्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में पड़कर दैन्यपूर्वक विनय करते हैं, तो वही श्रृंगार रस का मुख्य स्वरूप है। प्रियतम की विनय-वाणी से द्रवीभूत होकर, मान का त्याग कर श्री किशोरीजी जब प्यारे के प्रति मृदु वचन बोलती हैं, तो वही करुण रस की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानी जाती है।
मान छोडि मृदु बचन कहि, करुना रस निरधार ॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.8)
लालजी (श्रीकृष्ण) जब श्री प्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में पड़कर दैन्यपूर्वक विनय करते हैं, तो वही श्रृंगार रस का मुख्य स्वरूप है। प्रियतम की विनय-वाणी से द्रवीभूत होकर, मान का त्याग कर श्री किशोरीजी जब प्यारे के प्रति मृदु वचन बोलती हैं, तो वही करुण रस की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मानी जाती है।

