श्री वृषभांन कुंवरि कृपा करि,
मेरी ओर निहारो जू । [1]
मोसे हीन दीन कों कर गहि,
अपनों करि प्रति पारो जू ॥ [2]
गावत हरिवंसी हरिदासी,
विरद प्रसिध तिहारो जू । [3]
वंशी की पहचानि ‘किशोरी’,
अब जिनि मोहि विसारो जू ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
हे वृषभानु दुलारी, श्री राधा! कृपा कर मेरी ओर अपनी करुणा भरी दृष्टि डाल दीजिए। [1]
हे दीनों की रक्षक स्वामिनी! इस दीन-हीन की बाँह पकड़कर, जैसे भी हो, मुझे अपना बना लीजिए। [2]
श्री हरिवंशी (श्री हित हरिवंश) और श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास) सदा तुम्हारे ही गुणों का गान करते हैं। तुम्हारा यश तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। [3]
श्री किशोरी अली कहती हैं: “वंशी अलि जी की पहचान से, कृपा कर मुझे भी सदा के लिए अपना बना लो और कृपा कर कभी भी मुझे त्यागें नहीं।” [4]
मेरी ओर निहारो जू । [1]
मोसे हीन दीन कों कर गहि,
अपनों करि प्रति पारो जू ॥ [2]
गावत हरिवंसी हरिदासी,
विरद प्रसिध तिहारो जू । [3]
वंशी की पहचानि ‘किशोरी’,
अब जिनि मोहि विसारो जू ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
हे वृषभानु दुलारी, श्री राधा! कृपा कर मेरी ओर अपनी करुणा भरी दृष्टि डाल दीजिए। [1]
हे दीनों की रक्षक स्वामिनी! इस दीन-हीन की बाँह पकड़कर, जैसे भी हो, मुझे अपना बना लीजिए। [2]
श्री हरिवंशी (श्री हित हरिवंश) और श्री हरिदासी (स्वामी श्री हरिदास) सदा तुम्हारे ही गुणों का गान करते हैं। तुम्हारा यश तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। [3]
श्री किशोरी अली कहती हैं: “वंशी अलि जी की पहचान से, कृपा कर मुझे भी सदा के लिए अपना बना लो और कृपा कर कभी भी मुझे त्यागें नहीं।” [4]

