वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (44)

वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (44)

वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि तुच्छं मतं मम।
न यत्र त्वामहं वीक्षे वृन्दारण्य-विलासिनि॥

- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (44)

हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ है ।