(राग झँझोटी)
श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ।
अंकित पग मग धूरि विपिनकी, मम अंगन परसावौ॥ [1]
ललित किशोरी रसिक लाल संग, सुरतिरंग बरसावौ।
उमहीं घटा विजुरिया लौंकत, जीरा जिनि तरसावौ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)
हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ । [1]
अपने प्रियतम रसिकलाल के संग केली विलास की मधुर तरंगों से मेरे हृदय को पावन करें । श्री ललित किशोरी कहते हैं कि मेरे हृदय में तड़पती हुई विरह-ज्वाला को अपनी कृपा रूपी मेघ-वर्षा से शांत कर दीजिए। । [2]
श्रीराधारानी श्रीवन दृग दरसावौ।
अंकित पग मग धूरि विपिनकी, मम अंगन परसावौ॥ [1]
ललित किशोरी रसिक लाल संग, सुरतिरंग बरसावौ।
उमहीं घटा विजुरिया लौंकत, जीरा जिनि तरसावौ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (15)
हे श्री राधारानी! कृपा करके मुझे श्रीवृन्दावनधाम का दर्शन प्रदान करें जिससे मैं आपके चरणचिह्नों से चिन्हित वृंदावन की रज को अपने समस्त अंगों से स्पर्श करा सकूँ । [1]
अपने प्रियतम रसिकलाल के संग केली विलास की मधुर तरंगों से मेरे हृदय को पावन करें । श्री ललित किशोरी कहते हैं कि मेरे हृदय में तड़पती हुई विरह-ज्वाला को अपनी कृपा रूपी मेघ-वर्षा से शांत कर दीजिए। । [2]

